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जयपुर का इतिहास

राजस्थान सामान्य ज्ञान हिंदी में

जयपुर का पूर्व नाम जयनगर था भारत के पेरिस, दूसरा वृंदावन व गुलाबीनगर के नाम से प्रसिद्ध जयपुर नगर का निर्माण महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय के द्वारा 18 नवंबर 1727 में प्रख्यात बंगाली वास्तुशिल्पी विद्याधर भट्टाचार्य के निर्देशन में करवाया गया। जयपुर नरेश रामसिंह द्वितीय (1835-80) नें जयपुर की सभी इमारतों पर 1863 में प्रिंस अलबर्ट के जयपुर आगमन पर गुलाबी रंग करवाया। तभी से जयपुर गुलाबीनगर कहलानी लगा। बिशप हैबर ने इस नगर के बारे में कहा था कि नगर का परकोटा मास्को के क्रेमलिन नगर के समान है।

जयपुर के दर्शनीय स्थल

गलता, जयपुर -

"जयपुर के बनारस" के नाम से प्रसिद्ध प्राचीन पवित्र कुण्ड है। यहां गालब ऋषि का आश्रम था। वर्तमान में Monkey Valley के नाम से प्रसिद्ध है। गलता को "उत्तर तोताद्रि" माना जाता है।  संत कृष्णदास पयहारी ने यहां रामानंदी संप्रदाय की पीठ की स्थापना की।

शाकंभरी माता का मंदिर -

 सांभर में स्थित प्रसिद्ध मंदिर है शाकंभरी माता चौहानों की कुलदेवी है

जीण माता की डूंगरी, चाकसू

यहां पर शीतला माता का मंदिर है। शीतला माता का परंपरागत पुजारी कुम्हार होता है। यह मंदिर जयपुर के महाराजा श्री माधोसिंह जी ने बनवाया था

श्री गोविंद देव मंदिर -

गौड़ीय संप्रदाय के इस मंदिर का निर्माण सन 1735 में सवाई जयसिंह द्वारा करवाया गया तथा यहां वृंदावन से लाई गोविंद देवजी की प्रतिमा प्रतिस्थापित की गई। सिटी पैलेस के पीछे बने जयनिवास बगीचे के मध्य स्थित है

जगत शिरोमणि मंदिर, आमेर -

 इस मंदिर का निर्माण राजा मानसिंह प्रथम की रानी कनकावती ने अपने पुत्र जगत सिंह (जो संवत् 1656 में ( सन् 1599) असमय मृत्यु को प्राप्त हुए थे) की याद में करवाया था

आमेर की शिलामाता का मंदिर -

आमेर के राजप्रसाद के जलेब चौक के दक्षिण-पश्चिम कोने में शिला देवी का दुग्ध धवल मंदिर है शिला माता कछवाहा राज परिवार की आराध्य देवी है इस मूर्ति को जयपुर के महाराजा मानसिंह प्रथम 1604 ई. से बंगाल में लाए थे वर्तमान में बने मंदिर का निर्माण सवाई मानसिंह द्वितीय (1922-1949) ने करवाया था

पदमप्रभु मंदिर, पदमपुरा-बाड़ा -

जयपुर नगर से 35 किमी दूर ग्राम पदमपुरा में इस विशाल  दिगंबर जैन मंदिर की स्थापना सन 1945 में की गई थी।

मुवाय माता का मंदिर -

जयपुर के निकट जमुवारामगढ़ में स्थित इस मंदिर का निर्माण कछवाहा वंश के संस्थापक दूलहराय ने करवाया था जमुवाय माता कछवाहो की कुल देवी हैं

हवामहल -

गुलाबी नगर के प्रतीक के रूप में विख्यात हुए हवामहल का निर्माण सन 1799 में सवाईप्रताप सिंह ने करवाया था इसके वास्तविक लालचंद उस्ता थे इसमें 5_मंजिलें व 152 खिड़कियां हैं इसकी 5 मंजिलों के नाम शरद मंदिर, रतन मंदिर, विचित्र मंदिर, प्रकाश मंदिर और हवामंदिर है

जलमहल -

 जयपुर-आमेर मार्ग पर मानसागर झील में स्थित जल महल के निर्माण का श्रेय सवाई जयसिंह को दिया जाता है सवाई जयसिंह ने जयपुर की जलापूर्ति हेतु गर्भावती नदी पर बांध बनाकर मानसागर तालाब बनवाया

सिटी पैलेस (चंद्रमहल) -

यह जयपुर राजपरिवार का निवास स्थान था दीवाने-आम महाराजा का निजी पुस्तकालय (पोथीखाना) एवं शस्त्रागार (सिलहखाना) है पूर्व के मुख्य द्वार को सिरह ड्योढी कहते हैं 7 मंजिले इस महल का प्रथम तल सुखनिवास महल कहलाता है चंद्र महल का निर्माण सवाई जयसिंह द्वारा विद्याधर भट्टाचार्य के निर्देशन में करवाया गया था

जय निवास उद्यान -

चंद्र महल के सामने स्थित उद्यान जिसे राजा जयसिंह ने बनाया था उद्यान  के उत्तर में ताल कटोरा है इस उद्यान के ठीक मध्य में गोविंद देव जी का मंदिर बना हुआ है

सवाई मानसिंह संग्रहालय -

इस संग्रहालय की स्थापना सन 1959 में पूर्व  नरेश मानसिंह द्वितीय ने की थी

महाकवि बिहारी का प्रसाद, आमेर -

बिहारी, तुलसी के समकालीन कवि केशव के पुत्र थे ये आमेर नरेश मिर्जा राजा जयसिंह के दरबारी कवि थे उन्होंने आमेर में स्थित इसी प्रसाद में रहकर बिहारी सतसई की रचना की

सामोद महल -

यह ऐतिहासिक महल राजा बिहारीदास ने बनवाया था

जंतर-मंतर -

 संत 1734 में सवाई जयसिंह द्वारा निर्मित यह वेधशाला उनकी 5 वेधशालाओ में सबसे बड़ी है अन्य  वेधशालाएँ दिल्ली, उज्जैन, वाराणसी, व मथुरा में है यहां का रामयंत्र (ऊंचाई मापने हेतु) प्रसिद्ध है

अल्बर्ट हॉल (म्यूजियम) -

सन 1876 मैं प्रिंस अल्बर्ट द्वारा शिलान्यास एव सर स्विन्टन जैकब द्वारा रूपांकित यह इमारत भारतीय व फारसी शैली का मिश्रण है यह सवाई रामसिंह द्वितीय द्वारा अकाल राहत कार्यों की तहत प्रारंभ किया गया तथा महाराजा माधो सिंह के काल में 1857 में सर एडवर्ड ब्रेड फोर्ड ने उद्घाटन किया

रामबाग -

 ऐतिहासिक शाही उद्यानों की श्रंखला में रामबाग सिरमौर है वस्तुतः यह केसर बड़ारण बाग कहा जाता है जो सन् 1836 में बनवाया गया था महाराजा रामसिंह द्वारा इसे शाही मेहमानों, अतिथि राजाओं के ठहरने तथा बाद में स्वयं द्वारा निवास करने के कारण उनके नाम पर ही रामबाग कहलाने लगा

मांजी का बाग -

यह उद्यान महाराजा सवाई जयसिंह नें 1729 में अपनी प्रिय सिसोदिया रानी के लिए बनवाया था

 नाटाणी का बाग -

 आमेर रोड पर जयपुर रियासत के प्रधानमंत्री हरगोविंद नाटाणी द्वारा यह बाग महाराजा ईश्वर सिंह के कार्यकाल के दौरान सन 1745 में बनवाया गया था वर्तमान में यह उद्यान जयमहल पैलेस होटल में परिवर्तित हो गया है

 विश्व वृक्ष उद्यान -

जयपुर की दक्षिण-पूर्व दिशा में झालाना डूंगरी पर्वतीय अंचल में इस उद्यान की स्थापना विश्व वानिकी दिवस के अवसर पर 21 मार्च 1986 को की गई थी

अशोक विहार -

 राजधानी जयपुर के हृदयस्थल शासन सचिवालय के पीछे इस उद्यान की स्थापना वन विभाग द्वारा सन 1985 में की गई इस उद्यान में मर्ग वन भी है

गेटोर की छतरियाँ -

जयपुर के शासकों का शाही श्मशान घाट केवल 5 वर्ष में की शक्ति या नहीं महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय से लेकर महाराजा माधव सिंह तक के राजाओं और उनके पुत्र आदि की स्मृति में यह छतरियां पंचायतन शैली में बनी

सवाई ईश्वर सिंह की छतरी -

 जयपुर के सिटी पैलेस परिसर में जय निवास उद्यान के एक कोने में यह छतरी स्थित है जो सवाई माधो सिंह ने बनवाई

राजा मानसिंह प्रथम की छतरी -

 यह आमेर से लगभग 2 किमी की दूरी पर स्थित है

 कनक वृंदावन मंदिर -

 जल महल के निकट स्थित मंदिर जिसका निर्माण सवाई जयसिंह द्वारा करवाया गया था

ईसरलाट (सरगासूली) -

जयपुर में त्रिपोलिया गेट के निकट स्थिति सात खंडों की इमारत को महाराजा ईश्वरी सिंह राजमहल (टोंक) युद्ध में विजयी होने पर 1749 में बनवाया

विराट नगर -

 जयपुर अलवर मार्ग पर स्थित प्राचीन स्थल जहां बौद्ध मंदिर के अवशेष मिले हैं कहा जाता है कि पांडवों ने यहां अपने अज्ञातवास का 1 वर्ष व्यतीत किया था यहां भीम की डूंगरी स्थित है यहां अशोक के शिलालेख भी मिले हैं विराटनगर में अकबर द्वारा बनवाई गई टकसाल, मुगल गार्डन एवं जहांगीर द्वारा बनाई गई स्मारक है

साल्ट म्यूजियम -

 सांभर झील के किनारे बना म्यूजियम

विज्ञान उद्यान -

जयपुर में 12 दिसंबर 1994 को स्थापित

सलीम मंजिल -

 जयपुर में जोहरी बाजार के पास हल्दियों का रास्ता में स्थित ऐतिहासिक इमारत जहां विश्व महत्व की पैगंबर साहब की इस्लामी धरोहर सुरक्षित है

मुबारक महल -

 जयपुर राजप्रासाद परिसर में स्थित इस महल का निर्माण महाराजा सवाई माधो सिंह द्वितीय ने करवाया था इमारत के मेहमानों को ठहराने के लिए सन उन्नीस सौ में निर्मित इस महल में मुगल, यूरोपियों राजपूत स्थापत्य कला का अद्भुत समन्वय है

मुगल गेट -

 यह जयपुर जिले के विराट नगर में स्थित भव्य स्मारक है

आनंदपोल (हवामहल) -

गुलाबी नगरी जयपुर की पहचान हवा महल में स्थित राजकीय संग्रहालय का आंतरिक प्रवेशद्वार आनंद पोल है

आमेर दुर्ग (गिरीदुर्ग) -

राजा मानसिंह प्रथम द्वारा सन् 1592 ई. में निर्मित यह दुर्ग हिंदू मुस्लिम शैली का समन्वित रूप है रंग बिरंगे कांच की भव्य कलाकृति शीशमहल, सुख मंदिर, जगत शिरोमणि मंदिर, मावठा जलाशय, दिलाराम का बाग, केसर क्यारी दर्शनीय बादशाह औरंगजेब ने आमेर का नाम 1707 ई. में मोमीनाबाद रखा


जयगढ़ दुर्ग (गिरीदुर्ग) अन्य नाम: चिल्ह का टोला -

राजा मानसिंह प्रथम द्वारा सन् 1600 ई. में निर्मित इस दुर्ग का नाम मिर्जा राजा जयसिंह के नाम पर जयगढ़ रखा गया यहां लघु दुर्ग विजयगढ़ी हैं जहां महाराजा सवाई जयसिंह ने अपने छोटे भाई विजयसिंह (चिमाजी) को कैद में रखा था यहां मध्यकालीन शस्त्रास्त्रो का विशाल संग्रहालय व तोप ढालने का कारखाना है कछवाहा राजाओं का राजकोष भी यहाँ रखा जाता था एशिया की सबसे बड़ी तोप जयबाण जो महाराजा सवाई जयसिंह द्वारा निर्मित करवाई गई थी यहां हैं सुमट निवास, खिलबती निवास व विलास मंदिर जयगढ़ के प्रमुख महल है

नाहरगढ़ (सुदर्शनगढ़) (गिरी दुर्ग) -

यहां महाराजा सवाई द्वारा समाधोसिंगयेई. में मराठों के विरुद्ध सुरक्षा की दृष्टि से निर्मित करवाया गया जयपुर के मुकुट के समान इस किले में महाराजा माधोसिंह के द्वारा अपनी 9 पासवानों हेतु बनाये गये एक जैसे नौ महल है

चौंमुँहागढ़ (चौमूँ) -

ठाकुर कर्णी सिंह द्वारा 1595-91 ई. के मध्य निर्मित इसे धाराधारगढ़ एवं रघुनाथगढ़ भी कहते हैं माधो सिंह ने यहां हवा मंदिर नाम से अतिथि ग्रह का निर्माण कराया

 नरायणा (जयपुर) -

नारायणन में गौरीशंकर तालाब की निकट  भोजराज के बाग में खंगारोत शासको की भव्य छतरियां हैं

पन्ना मीणा की बावड़ी आमेर -

आमेर में स्थित इस बावड़ी का निर्माण 17 वी शताब्दी में मिर्जा राजा जय सिंह के काल में करवाया गया

माधोराजपुरा का किला (स्थल दुर्ग) -

जयपुर के महाराजा माधव सिंह प्रथम नें मराठों पर विजय के उपरांत निर्मित कराया इस किले के साथ टोंक के नवाब अमीर खान कि बैगमों को बंधक बनाने वाले लदाणा के भरत सिंह नरूका की वीरता की रोमांचक दास्तान जुड़ी हुई है यह किला जयपुर की फागी तहसील में स्थित है

 अन्य स्थल -

देवयानी कुंड-सांभर, भारमल की छतरियां-जयपुर, रघुनाथ मंदिर-जमवारामगढ़, महारानी की छतरी-जयपुर

बीकानेर का इतिहास


  • राव बिका (1465-1504) जोधपुर के संस्थापक राव जोधा के पुत्र राव बिका ने अपने पिता से अलग होकर अपने विश्वस्त सरदारों के साथ नये राज्य की स्थापना हेतु जांगल प्रदेश की ओर प्रस्थान कर दीया और करणी देवी के वरदान से अनेक छोटे-बड़े स्थानों को जीतकर जांगल प्रदेश में सन 1465  में राठौड़ राजवंश की स्थापना की उन्होंने 1488 ईस्वी में बीकानेर नगर की स्थापना कर उसे अपनी राजधानी बनाया अपने राज्य को दूर-दूर तक विस्तृत कर राव बिका 1504 में स्वर्गवासी हुए।



  •  राव लूणकरण (1504-1526) ईसवी अपने बड़े भ्राता राव नरा की मृत्यु के बाद साहसी योद्धा राव लूणकरण  बीकानेर की गद्दी पर बैठे



  • राव जेतसी (1526-1542 ई. ) -अपने पिता की मृत्यु के बाद राव जैत सिंह ने बीकानेर की बागडोर संभाली। इनके समय में बाबर के पुत्र व लाहौर के शासक कामरान ने सुदृढ़ किले भटनेर को सन 1534 के आसपास आक्रमण कर अपने अधिकार में कर लिया । इसके बाद कामरान ने बीकानेर पर आक्रमण किया तथा एक बार तो उस पर कब्जा कर लिया परंतु राव जैतसी ने 26 अक्टूबर 1534 को एक मजबूत सेना एकत्रित कर कामरान पर आक्रमण कर दिया ।अप्रत्याशित आक्रमण से मुगल सेना बीकानेर छोड़ कर भाग खड़ी हुई और राव जैतसी की विजय हुई।


 हमें इस युद्ध का विस्तृत वर्णन विठू सुजा कृत "राव जेतसी रो छंद" ग्रंथ में मिलता है। सन 1544 ने शेरशाह सूरी ने मालदेव को गिरी सुमेल के युद्ध में हरा दिया,  इसमें राव जैतसी के पुत्र कल्याणमल ने शेरशाह की सहायता की थी। शेरशाह ने बीकानेर का राज्य राव कल्याणमल को दे दिया।


  • राव कल्याणमल (1544-1574) ई. राव मालदेव की पराजय के बाद सन् 1544 में राव कल्याणमल बीकानेर का शासक बने। वे बीकानेर के पहले शासक थे जिन्होंने सन 1570 ईस्वी को अकबर के नागौर दरबार में उपस्थित होकर उसकी अधीनता स्वीकार की एवं मुगलों से वैवाहिक संबंध स्थापित किए तथा अपने छोटे पुत्र पृथ्वीराज, जो उच्च कोटि का कवि एंव विष्णु भक्त था को अकबर की सेवा में छोड़ दिया। अकबर के नवरत्नों में से एक था। इसी पृथ्वीराज ने 'बेली किसन रुक्मणी री' नामक प्रसिद्ध काव्य ग्रंथ की रचना की थी। अकबर ने नागौर दरबार के बाद सन् 1572 ई. में राव कल्याणमल के पुत्र रायसिंह को जोधपुर की देखरेख के लिए नियुक्त कर दिया। सन 1574 में राव कल्याणमल की मृत्यु हुई।
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Hi, Its me Hafeez. A webdesigner, blogspot developer and UI/UX Designer. I am a certified Themeforest top Author and Front-End Developer. I'am business speaker, marketer, Blogger and Javascript Programmer.

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